Tuesday, October 16, 2007

सुन्दर नारी

चंद्र सुशीतल धवल ज्योत्सना, इंदु की रमणीक कलाएं
इस मनमोहक वातावरण में, घूमती हैं चितचोर बलायें
ये सागर मोती सी उज्जवल, दिव्य सुमन की हैं मालाएं
नयन झुके हैं अधर रुके, कितनी कोमल होती बालाएँ

श्याम लोचनों का अवगुन्ठन डाले प्रतीत ये होती हैं (अवगुन्ठन = जाल)
अति आकर्षक अति मनमोहक, कितनी शीतल ये ज्वालाएं
नयन झुके हैं अधर रुके, कितनी कोमल होती बालाएँ

कविताओं का जन्म ह्रदय से, इन्हें निरख कर होता है
कवि कल्पना को पर देंती, रस श्रृंगार की है शालायें
नयन झुके हैं अधर रुके, कितनी कोमल होती बालाएँ

रुप है ज्यों मदमत्त वारुणी, धवल वर्ण है आभावान (वारुणी = शराब)
नयन बाण से धरा हिलाती, सबल है कितनी ये अबलायें
नयन झुके हैं अधर रुके, कितनी कोमल होती बालाएँ

लेकिन

सत्य शील और ज्ञान हो इनमें, होती जग में पूजा इनकी
रुप गुणों की स्वामिनियों से, 'अभिषेक' करे इतनी ही विनती
तीन गुणों की कमी में अपनी, अपूर्णता समझें महिलाएं
नारी सा गौरव धारण कर, सर्वांग रुपिणी वे कहलायें
नयन झुके हैं अधर रुके, कितनी कोमल होती बालाएँ

अभिषेक जैन
ज़ीयस न्युमरिक्स
१८ अक्तूबर २००७

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