Saturday, September 15, 2007

मेरा परिणय

एक बाला से मैं करूं प्रेम, एक बाला मुझसे करती प्रेम
जिस बाला से मैं करूं प्रेम
तव नयन युगल हैं सदय सजल, ज्यों ज्ञान ज्योति निर्मल
तव ह्रदय कमल में प्रेम विपुल, चारित्र प्रीति निश्चल
तव ध्येय विमल है देह अमल, प्रभु निरख सकूं प्रतिपल
एक बाला से मैं करूं प्रेम, एक बाला मुझसे करती प्रेम

जो बाला मुझसे करती प्रेम
तव नयन युगल हैं अदय निबल मॆं क्रूर करें घायल
तव चरित भ्रष्ट है अहित स्पष्ट, मृग मरीचिका सा मरुथल
तव ध्येय समल मम पतन अटल, जो प्रीत करूं एक पल
एक बाला से मैं करूं प्रेम, एक बाला मुझसे करती प्रेम

मुक्ति बाला से मैं करूं प्रेम, किसविध कह जाऊं अपना क्षेम
मम आत्मा सुदृढ़ ना, बुद्धि प्रखर ना
ब्रह्म का ना संबल, वैराग्य हुआ ना प्रबल
एक बाला से मैं करूं प्रेम, एक बाला मुझसे करती प्रेम
भुक्ति बाला मुझसे करती प्रेम, वह राख करती निज आत्म हेम
तव मोह पाश मैं हो निश्वास
खो रहा है आतम बल, भय लगा हुआ प्रतिपल
एक बाला से .......

मुक्ति बाला आलिंगन कर मैं, सौख्य पाऊं अविचल
राग जाल मॆं बंधा ना समझूँ, इस भुक्ति का छल
चाहूँ मुक्ति का स्वामी बनूँ पर, भुक्ति बांधे मेरे चरण द्वय
कहे मुक्ति के मोह सहित हो, संभव नहीं हमारा परिणय

कर जोड़ करूं मैं प्रभु प्रार्थना, तव भक्ति मुझे दे ऐसी साधना
सिद्ध बनूँ मैं बुद्ध बनूँ, कर्म कलंक से शुद्ध बनूँ
जिस बाला से मैं करूं प्रेम, कह पाऊं सबल हो अपना क्षेम
तप कर कुंदन हो आया सुंदरी, जिनवर नन्दन हो आया सुंदरी
कष्ट हुआ अवश्य विकराल, भुक्ति को ह्रदय से दिया निकाल
युग तृषित पुरुष को ये अवसर दो, भव भ्रमित मनुज को इच्छित वर दो
जगजाल व्यथा का शीघ्र हरण हो, मेरा तुमसे अब पाणिग्रहण हो
पुनर्जन्म का छूटे दल दल, प्रभु यही प्रार्थना करूं मैं पल पल
जिस बाला से मैं करूं प्रेम
वह बाला मुझसे भी करे प्रेम


अभिषेक जैन
ज़ीयस न्युमरिक्स
१८ अक्तूबर २००७